तुम चली गई, यह दिल अकेला रह गया।
मेरे सपनों में जब तुम प्रिया बनकर आती हो,
सुरमई सारा जग लगता, दिल को बहुत रिझाती हो,
जब कांधे पे सर रखकर तुम,एक शब्द प्रेम का कहती हो,
हर्षित हो कर तन जगता है,पर निकट नही तुम रहती हो,
सुबह होते ही यह स्वप्न, फिर यादों संग भह गया,
तुम चली गई यह दिल अकेला रह गया।
भोर होते ही फिर, तुम्हारी याद बहुत सताए,
विरह व्यथा को इस मन की अब हम किसे बताए,
तुम्हारी एक एक छवि क्यू मन को लुभानी लगती है,
नयनो में मेरे नित, क्यों तुम्हारी यादें ही जगती है,
तुम्हारे विरह की हर पीड़ा को में प्यार समझ के सह गया।
तुम चली गई यह दिल अकेला रह गया।
तुम दूर गई यह बात सही, वापस तुम फिर कब आओगी,
दर्द हुआ जो उस पर तुम अब हल्दि कब लगाओगी,
मन हार गया जग जीत गया, ईस पल को कब भूलवाओगी
फिर से नई यादो को लेकर, कब प्रेम का जगत सजाओगी,
जो दर्द भरा था मन में वो आँसुओ संग बह गया।
तुम चली गई यह दिल अकेला रह गया।
आकर निकट कभी तुम हमसे कभी मिलो माही,
हम मिले कभी ऐसे, जैसे कोई अनजाने राही,
ईस पल को फिर में जीवन मे नित नित जीना चाहूँगा,
हर एक दिन ऐसा आए फिर बस यही लालसा चाहूँगा,
तुमसे मिलकर मेरा मन तुम्हारी यादों में ही रह गया।
तुम चली गई यह दिल अकेला रह गया।
शिव……।